Thursday, August 25, 2011

मेरी शहर की बरसात

इससे ज्यादा और क्या रोज़ेदारी होगी रोमिल 
उसका नाम जो सुबह-शाम लिया करते हो.
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उसको पाने की ख्वाइश में भीग जाता हूँ रोमिल
मेरी शहर की बरसात ही कुछ ऐसी है
जब बरसती है
उसका चेहरा बना जाती है.
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#रोमिल

Thursday, August 18, 2011

my dil goes mmmmm

खुद से ही बातें करती है
सबको समझाती रहती है
जैसे दादी-अम्मा हो कहीं की
किताबों में खोई रहती है
टीवी चलाकर सोती है
आई पोड में उलझी रहती है...

मगर जब वोह चश्मा लगाये
थोडा गुस्से में आये
मेरा कोलर पकड़कर मुझे धमकाए
प्यार से गाल पर थप्पड़ मुझे वो मार जाये 
my dil goes mmmmm

Monday, August 15, 2011

तेरी बातों की बौछार में भीग जाना चाहता हूँ

तेरी बातों की बौछार में भीग जाना चाहता हूँ
मैं आज बरसात का मज़ा लेना चाहता हूँ.

तेरा चेहरा धुंधला-धुंधला सा नज़र आता है
खिड़की के शीशे पर पड़ी पानी की बूंदों के पीछे से
मैं आज फिर तुझे छुप के निहारना चाहता हूँ.

तेरे ख़त आते रहते थे तो दिल को यह तसल्ली थी
कि मेरा कोई अपना है
मैं आज फिर उसी अपनेपन का शिकार होना चाहता हूँ.

तू इतनी करीब है कि बहुत दूर सी लगती है
मैं आज तुझसे वही दूर वाला सच्चा प्यार चाहता हूँ.

तेरी बातों की बौछार में भीग जाना चाहता हूँ
रोमिल, मैं आज बरसात का मज़ा लेना चाहता हूँ...

#रोमिल

Saturday, August 13, 2011

रास्ते अनजान से नज़र आते है

रास्ते अनजान से नज़र आते है
दूर-तलक किसी के खून से सने क़दमों के निशां से नज़र आते है
भर आई आँखें यह मंजर देखकर रोमिल
हाथों में हाथ पकड़े दो दीवानों लाश से नज़र आते है!

कौन कातिल?
किसका क़त्ल हुआ?
यह सवाल खुद गुमनाम से नज़र आते है.

दो क़दम चला कि
दिल बोल उठा रोमिल
घर की दीवारों में कितने पंछी आज भी क़ैद नज़र आते है.

और कौन देगा इनकी लाश को कन्धा 
घर वाले ही इनके कातिल नज़र आते है.

#रोमिल

Friday, August 12, 2011

किस बात की सफाई देना चाहता है वो

न जाने
किस बात की सफाई देना चाहता है वो
हमने तो यह भी नहीं कहाँ गुनहगार है वो.
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वैसे भी
शतरंज सी उलझी है मेरी ज़िन्दगी
दो चालों में ही इश्क की बाज़ी हार गया वो.
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किताबों के पन्नो को पलटकर सोचता हूँ मैं रोमिल
क्या ज़िन्दगी भी पीछे पलटकर, मेरे साथ शुरु कर सकता है वो.
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और खुद को क्यों इल्ज़ाम देते हो अनजाने सफ़र के साथी
अपनी तबियत ही कुछ ऐसी है कि हर जगह नज़र आता है वो.

#रोमिल

Tuesday, August 9, 2011

बारिश कोई भूली सी कहानी कह जाती है

बारिश कोई भूली सी कहानी कह जाती है
जानी सी पहचानी सी जिंदगानी कह जाती है

अक्सर आसमान से गिरते पत्थर मुझे दिल टूटने का एहसास दिला देते है
अक्सर बारिश की छम-छम सी आवाज़ मेरी आँखों से आंसू गिरा जाते है
अक्सर खिड़की पर बैठकर दूसरे को बारिश का मजा लेते देखना मुझे मेरी मजबूरी बता जाते है
अक्सर घर की टूटी हुई छत से गिरता पानी मुझे आंसू से भीगे खतों की याद दिला जाते है...

रोमिल, बारिश कोई भूली सी कहानी कह जाती है
जानी सी पहचानी सी जिंदगानी कह जाती है...

#रोमिल

Thursday, August 4, 2011

महीने हुए मुलाक़ाते नहीं होती

महीने हुए मुलाक़ाते नहीं होती
दरीचों से छुप-छुप कर झांकते रहते है बातें नहीं होती.

लफ्ज़ जैसे ठहर से गए हो
आँखें जैसे पथरा सी गई हो
बड़ी बेचैन सी रहती है यह खिड़कियाँ 
दरीचों से छुप-छुप कर बातें नहीं होती.

बहुत मशरूफ़ रहता है आजकल वो
दिनभर आवारा बना रहता है आजकल वो
किस कूचें, किस गली, किस चौक पर बैठा है आजकल वो
आज कल उससे छत की मुंडेरों पर मुलाकातें नहीं होती..

महीने हुए मुलाक़ाते नहीं होती
रोमिल दरीचों से छुप-छुपकर झांकते रहते है बातें नहीं होती.

#रोमिल