Sunday, September 4, 2011

मरने के पहले

दो घड़ी देख लूँ उसको मरने से पहले
रोमिल, खुदा से यह आरज़ू हैं मेरी मरने से पहले

वोह खुद में ही खोया रहता है खुदा की तरह
चाहे दीवाना लाख बार मरे, मरने से पहले

मासूम चेहरे पर, झूठ लपेटकर
कितनी बार ज़िन्दगी से समझौता कर लेता है इंसान, मरने से पहले

न शिकवा, न शिकायत, न दिल में कोई बैर रखना
एक बार तो दिल से मिल जाओ, मरने से पहले.

#रोमिल

Saturday, September 3, 2011

तोहफे का दिलासा

तोहफे का दिलासा देकर मना लेती है
चाँद को खिलौना बता के सुला देती है
यह माँ ही होती है रोमिल
जो खुद भूखा रह कर, बच्चों को खाना खिला देती है...

#रोमिल

परिंदा

यह कैसा परिंदा निकला मेरा दिल रोमिल
पानी - पानी भी चिल्लाता रहा
मगर तेरे दर का पानी भी ना पिया...

#रोमिल

Friday, September 2, 2011

अंजाम

मेरा कुछ भी अंजाम हो मोहब्बत में रोमिल
लेकिन मैं जाते-जाते
उसे मोहब्बत करना सीखा जाऊँगा...

#रोमिल

Wednesday, August 31, 2011

मौसम

मौसम भी सर्द था
हल्का-हल्का कोहरा फैला हुआ था
सूरज अभी अंगराई ले रहा था, बस जगा-जगा सा था
बस स्टैंड पर मैं थी और सन्नाटा था...

एक जाना-पहचाना सा अनजान चेहरा मेरे पास आया
हाथों में गुलाब और एक ख़त साथ लाया

देते हुए मुझसे बोला

"रात भर सोचता रहा कि तुझे क्या लिखूं?
ऐसा क्या नहीं लिखा है मैंने पहले तेरे बारे में,
जो अब लिखूं?
लफ्ज़ अब रहे ही नहीं है
बस कोरे कागज़ पर तेरा नाम लिख लाया हूँ
बाकी जो तू चाहे
जिसका तू चाहे
नाम लिख सकती है
हाल-ए-दिल लिख सकती है
पैगाम लिख सकती है...
गलती से अपना पता ही ख़त पर लिख लाया हूँ"

बस स्टैंड पर खड़ी मैं सोचती रही क्या जवाब दूं उसे,
ख़त पर क्या लिखकर भेज दूं उसे,
बस मैंने भी एक अनजान नाम, उसके नाम के साथ लिख दिया
और ख़त उसके पते पर भेज दिया.

कितना पागल निकला वो रोमिल 
अभी तक उसी नाम को जपता रहता है
कभी सजदा करता है
तो कभी आँखों से चूम लेता है
कभी रुमाल से ख़त को साफ़ किया करता है
तो कभी रेशमी रुमाल से लपेट लिया करता है...

जाने कैसा मौसम था
जाने आज कैसा मौसम है...

#रोमिल

Friday, August 26, 2011

chalo yaar ko khuda banate hai

kaaba per sar jhuka ke bhi kahan mila tha khuda romil
chalo yaar ko khuda banate hai
uske sajde mein sar jhukate hai...

#Romil

क़ाबा पर सर झुका के भी कहाँ मिला था खुदा रोमिल 
चलो यार को खुदा बनाते हैं 
उसके सजदे में सर झुकाते हैं...

#रोमिल

इरादा नहीं था

क़सम से...


मेरा, तेरा दिल दुखाने का इरादा नहीं था
तुझे गम की गलियों में ले जाने का इरादा नहीं था.

यूँही चले आये थे हम तोह साहिल किनारे 
किसी कश्ती को डूबाने का इरादा नहीं था.

बस मुस्कुरा देते है
किसी को मुस्कुराता देखने की चाह में
मेरा किसी पर कीचड़ उछालने का इरादा नहीं था.

यूँही मार बैठे पत्थर हम पेड़ पर
मेरा किसी पंछी की जोड़ी को डाल से उड़ाने का इरादा नहीं था.

क्या पता था इस वीरान घर में भी कोइए रहता है रोमिल 
मेरा इस घर में यादों को जलाने का इरादा नहीं था.

इरादा नहीं था..

सच्ची...