Tuesday, January 31, 2012

माँ का चेहरा देख लेता था तो हज मेरी हो जाती थी.

माँ का चेहरा देख लेता था तो हज मेरी हो जाती थी.
उसकी सेवा कर लूं तो, ईश्वर-सेवा की ख्वाइश पूरी हो जाती थी...

खुदा ने भी कुरान में माँ को जन्नत सा दर्जा दिया
उसके क़दमो में मुझे जन्नत मिल जाती थी...

आँखों से उसके सारा संसार देख लेता था
उसकी उंगलियाँ पकड़कर हर मंजिल मुझे मिल जाती थी...

थी ममता उसमे इतनी सागर भी कम पड़ जाये
रोमिल उसकी बाहों में मुझे हर ख़ुशी मिल जाती थी...

#रोमिल

कभी थपकी तो कभी लोरी देकर सुलाती थी

कभी थपकी तो कभी लोरी देकर सुलाती थी
जब मैं बीमार होता था तो डॉक्टर को बुलाकर लाती थी
अपने आँचल से मेरे आंसू को पोछ देती थी
जब मैं पढ़ता था तो माँ रात भर जागती थी.

हर पल मेरा साथ देती थी
रोमिल, हर पल मेरा साथ देती थी.
माँ मेरी आत्मा होती थी.

#रोमिल

धूप में छाँव सी होती है माँ

रोमिल, धूप में छाँव सी होती है माँ
हर ज़ख्म पर मरहम सी होती है माँ
यम भी जिसे छू न सके
वो दुआ सी होती है माँ...

#रोमिल

Monday, January 30, 2012

माँ की याद बहुत आती है...

आँगन में तुलसी जब खिलती है
माँ की याद बहुत आती है...
जब चिड़ियाँ द्वार पर चिचिहाती है
माँ की याद बहुत आती है...
***
सुखमनी साहिब के शबद जब सुनूँ
कुर्सी पर बैठी माँ की झलक नज़र आती है...
गैस के चूल्हा पर जब खीर पके
माँ की याद बहुत आती है...
***
दरवाज़े की घंटी जब बजाऊँ
ऐसा लगता है माँ दौड़ी चली आती है
तकिये पर जब सर लगाऊं
माँ की गोद बहुत याद है
माँ की याद बहुत आती है...
***
सूनापन घर में फैला रहता है
खिड़की से भी सूरज नज़र नहीं आता है
अँधेरा मन में छाया रहता है
आँखों से जल बह जाता था
रोम - रोम माँ पुकारता है...
माँ की याद बहुत आती है...
रोमिल माँ की याद बहुत आती है...

#रोमिल

माँ के हाथों से बनी दाल रोटी याद आती है

माँ के हाथों से बनी दाल रोटी याद आती है
मुझे वही बचपन की बातें याद आती है...

कितने नखरे करता था मैं खाने में
गोदी में बैठाकर, वो माँ की दुलार याद आती है...

बिस्तर पर दाल गिरा देता था
कमरे में रोटी बिखरा देता था
बड़े प्यार से वो अन्न की इज्ज़त करना सीखाती थी
वो सीख याद आती है...

मेरे पीछे कटोरी लेकर दौड़ना
रोमिल, मेरे पीछे कटोरी लेकर दौड़ना
वो दिन-रात की उसकी भागम दौड़ याद आती है...

माँ के हाथों से बनी दाल रोटी याद आती है
मुझे वही बचपन की बातें याद आती है...

#रोमिल

Friday, January 27, 2012

मेरी माँ के कदमो के सिवा कुछ भी नहीं

यह मंदिर, यह मस्जिद, यह दर कुछ भी नहीं
रोमिल, मेरी माँ के कदमो के सिवा कुछ भी नहीं

बिन मांगे ही हर खवाइश पूरी हो जाती है
यह पत्थर के भगवानों के वादे कुछ भी नहीं...

ममता, प्यार, दुलार, स्नेह का ऐसा संगम है
जिसके आगे संगम स्थल कुछ भी नहीं...

शिष्टाचार, व्यवहार, ज्ञान, इंसानियत का वो सबक मिला है
जिसको पढ़कर, किताबों के सबक कुछ भी नहीं...

#रोमिल

माँ क्या मिली मैं खुदा को भी भूल गया...

माँ क्या मिली मैं खुदा को भी भूल गया...
अब और क्या कहने को रह गया...

उसकी आँखों में इतनी ममता दिखी
मैं उसी जन्नत में सुकून-चैन से रह गया...

उसकी गोद में इतना आराम मिला
सब ऐशो-आराम का सामान धरा सा रह गया...

हर जन्म में यही माँ मिले
रोमिल, मेरी सब आरजूओं का बस यही एक सार रह गया...

#रोमिल